भारत में जातिवाद
यदि हम अपने इतिहास पर एक विहंगम दृष्टि डालें
तो हमें भली भांति ज्ञात हो जायेगा कि संसार में भारत ही
एक ऐसा राष्ट्र रहा है जहाँ
बहुत लम्बे समय तक
सामंतवाद का ही बोलबाला रहा है| हिन्दू
शासकों से ले कर मुगलों और यहाँ तक कि अंग्रेज़ शासनकाल में भी इसी शासन पद्धति का बोलबाला रहा है, हालाँकि उनके अपने देश में उन्नीसवीं शताब्दी
के मध्य में ही राजाशाही के स्थान पर लोकतान्त्रिक सरकारों का गठन हो चुका था परन्तु उन्होने
अपने राजसी हितों को पूरा करने के लिए भारतीय सामंतवादी शासन प्रणाली को प्रचलित रखने में ही अपना लाभ समझा
था|
यही कारण था कि सन् १९४७ की १५ अगस्त तक अंग्रेज़ों
ने अपने बलबूते पर भारतीय जनता के कंधों पर इसे पूरी तरह लादे ही रखा और जाते समय
उन्हें यह स्वतंत्रता भी दे दी थी कि यह उनकी इच्छा पर निर्भर करता है कि यदि वे
चाहें तो अपने राज्य को भारत से स्वतंत्र भी रख सकते हैं| परिणामतः जातिवाद जो सामंतवादी विचारधारा कि देन था भारतीय लोगों कि मानसिकता
का अभिन्न अंग बन चुका था कि स्वतंत्रता प्राप्ति के ६० वर्ष तक भी हम इस कलंक से
मुक्त नहीं हो सके हैं|
स्वाधीन राष्ट्र के
कर्णाधार नेतृत्व ने भी अपनी उदारवादिता भरपूर वृत्ति के प्रभाव अधीन नवगठित
सविधान को लागू करते समय इस कलंक से मुक्त होने के स्थान पर दलित तथा अनुसूचित जनजातीयों
के साथ साथ पिछड़ी –श्रेणियाँ को अपने वोट बैंक के रूप में
परिवर्तित करने के लिए संरक्षण का झुनझुना देकर जातिवाद के कलंक को समाज के माथे
पर और भी गहरा कर दिया था| तत्पश्चात भारतीय समाज इस व्याधि ने इतनी बुरी
तरह जकड़ लिया कि यह कैंसर रोग कि तरह मिटने का नाम ही नही लेता| इसके विपरीत इस मृगमरीचिका ने तो समाज के उन भागों को भी आकर्षित कर लिया है जो
अपने व्यव्हारिक जीवन में तो स्वर्णजाति वाले कहलवाते हैं परंतु संरक्षण का लाभ
लेने के लिए ओ.बी.सी अथवा दूसरी पिछड़ीजातियओं का अधिकार पाने के
लिए संघर्षशील हैं जैसाकि राजस्थान तथा हरियाणा का जाट आन्दोलन|
हमारा यह सामाजिक- न्याय पर्दे के पीछे कुछ और ही बनकर उभरा है|इसे आर्थिक तथा सामाजिक
न्याय दिलाने के बहाने संकीर्ण राजनितिक हितों ने इतनी बुरीतरह जकड लिया है कि अब
यह हमारे राजनैतिक लोगों के गले का ऐसा हार बन चुका है कि अब न यह उतारे उतरता है और
न पहने पहना जाता है| यह तो सफैद दिन की तरह साफ है कि
जातीवाद कि जड़ें हमारे समाज में इतनी गहरी पहुँच चुकी हैं कि अब उन्हें थोडा. सा हिलाना भी
जानलेवा सिद्ध हो सकता है| यही कारण है कि जातीवाद पर आधारित संरक्षण देने
की अवधि २६ जनवरी सन् १९६५ को पूर्ण हुए चार दशक बीत जाने के उपरांत भी आजतक बार-बार संविधानिक
संशोधन करके अवसरवादी राजनीति को बढ़ावा दिया जा रहा है| वास्तविकता तो यह है कि वर्तमान राजनितिक अवसरवादी रुझान में वाम पार्टियों को
छोड़कर दूसरी किसी भी राजनीतिक दल में यह दम नहीं है कि वह इसका विरोध क्रर सके| इसके उलट वे तो इसका घेरा और विस्तृत करवाने के लिए संघर्ष करने को तत्पर रहती
हैं| यही कारण कि यह समस्या और भी विकट रूप धारण करती जा रही है| अब वह दिन दूर नहीं जब समाज को इस विषैले वातावरण से और भी गंभीरता से निपटना
पड़ सकता है| पिछले लगभग ५० वर्षों का इतिहास ग्वाह है कि इस
अवधि दौरान अनेकों ऐसे अवसर आए जब इस मुद्दे पर कितनी बार देश में जातिवादी आरक्षण
को लेकर संकटकालीन परिस्थितिओं जैसी अवस्था पैदा हो जाने के कारण राष्ट्र को यह
विष अमृत मानकर कर पीना भी पड़ा है|
जो समाज शताब्दियों
तक जातिवादी अन्याय के आधार पर अपने एक बहुत बड़े भाग को सामाजिक अन्याय के आधार पर
दलित कह कर प्रताडित करता आया हो तथा उसके आर्थिक शोषण द्वारा उसे अमानवीय जीवन
जीने के लिए विवश ही नही करता रहा अपितु उसे अपने हर प्रकार के दमन से पीड़ित भी
किया| उस समाज में दलित तथा दूसरे शोषित वर्ग को केवल आरक्षण जैसी
संविधानिक सुविधा के सहारे कैसे छोड़ा जा सकता है? सामाजिक अन्याय को समाप्त करने के लिए तो पर्याप्त सामाजिक तथा राजनैतिक बल का
प्रयोग ही करना पडेगा तब कहीं जाकर समाज का स्वामी कुलीन-वर्ग उन्हें अपने
समान विकास के अवसर प्रदान करने के लिए विवश होगा| वास्तव मे संविधानिक संरक्षण-अवधि तथा उसके घेरे को और आगे से आगे बढ़ाने से
तो जातीवाद कि बीमारी और भी व्यग्र होती चली जायेगी और इसका कभी भी अंत होनेवाला
नहीं है| परिणामस्वरुप भारतीय समाज में श्रमजीवी वर्ग परस्पर विभाजन का
शिकार बनकर कुलीन-वर्ग केलिए गुप्त वरदान ही सिद्ध होगा|
पूंजीवादी संसदीय
लोकतंत्र शासन-प्रणाली में जातीवादी आरक्षण का सब से अधिक लाभ
तो कुलीन-वर्ग के पूंजीपतियों को अनायास ढंग से ही हो रहा
है| उनकी बांटो और राज करो कि कूटनीति स्वत: ही अनायास ढंग से सफल हो रही है|वैसे तो समाज विभीन्न धर्मों के नाम पर पहले ही
इतनी बुरी तरह विभाजित है कि इसका विकराल रूप देखकर ऐसे लगने लगता है कि ये
धार्मिक कट्टरपंथी लोग भारतीय न होकर किसी
विदेशी भाईचारे से आए हैं| इस से बड़ा दुर्भाग्य यह है कि राष्ट्र जातीयों के
नाम पर इतनी बुरी तरह विभाजित है कि विवाह-शादी तथा सामाजिक लेनदेन के मामले में विभीन्न विभीन्न
जातियों वाले एक दूसरे से दूर ही नहीं भागते अपितु उन्हें सामाजिक शत्रु की तरह
समझते भी हैं| परिणामत: वे सभी यद्यपि श्रेणी के तौर पर श्रमिकश्रेणी से
ही सम्बंधित होते हैं| परन्तु जातियों के रूप में बंटे होने के कारण
उन्हें अपने सामूहिक वर्ग –शत्रु पूंजीपति के विरुद्ध एकजुट करना उतना ही
असम्भव है जितना उनके सामाजिक व्यवहार में एकजुट करना असम्भव है| यही कारण है कि श्रमिक वर्ग की बुनियादी फूट के कारण लुटेरा वर्ग को अपने
लक्ष्य की पूर्ति केलिए कोई विशेष प्रयत्न नहीं करने पड़ते और उनके पौ बारह होते
रहते हैं| जातीवाद ने न केवल संसदीय चुनावों में ही
विभिन्न धर्मों, जातियों तथा साम्प्रदायों के आधार पर वोटबैंक
बनाकर बाँट रखा है अपितु श्रमिकों के संगठनों को भी इसी आधार पर बंट जाने के कारण
अपने अधिकारों के संघर्ष में भी एकजुट होकर लड़ने के स्थान पर परस्पर जातीवादी होड
में जुटे होने के कारण अपनी नव आप ही डूबाते रहते हैं| इस तरह उनकी फूट का लाभ उठाकर मालिक, पूंजीपति तथा अधिकारी लोग अपना उल्लू सीधा करने
में आसानी से सफल हो जाते हैं| श्रमिक वर्ग-जैसे सरकारी
कर्मचारी,मिल-मज.दूर,कृषक,खेत-मज.दूर तथा अन्य बुद्धिजीवी आदि-सभी इसी कारण अपने
वर्ग-संघर्ष को आज तक किसी किनारे नहीं लगा सके हैं|
जातिवादी आरक्षण ने
अपने कुप्रभाव से हमारे समाज को न केवल सामाजिक, आर्थिक, भाईचारिक तथा राजनैतिक फूट का शिकार बनाया है, बल्कि कठोर साम्प्रदाय्कता के रूप में भी विभाजित कर दिया है|आरक्षण की
प्रतिद्वंदता की होड ने हमारे सभ्यचारिक रीतिरिवाजों, त्योहारों तथा उत्सवों को भी इस आग में ऐसा झुलस दिया है कि वर सामूहिक रहने
के स्थान पर जातीय बनकर रह गए हैं| अब उनका समाजिक चरित्र ही बदला-बदला लगता है| ईद मुस्लिम, दिवाली हिन्दू-सिखों तथा क्रिस्मस
ईसाई धर्म वालों के ही त्यौहार बन कर रह गए हैं|
जाति,वर्ग और सम्पत्ति के
सम्बन्ध में कुच्छ प्रासंगिक अंश:-
”इस जमाने के उस मुख्य संघर्ष से अलग-थलग करके हिन्दू
समाज की तरह पेश नहीं किया जा सकता, जो कृषि-क्रांति का संघर्ष है,जो इजारेदारों और
साम्राज्यवादियों द्वारा किए जा रहे शोषण के खातमें का संघर्ष है, जो समाजवाद की ओर लेजाने वाले जनता के जनवादी-राज्य की स्थापना का
संघर्ष है|” (बी.टी.आर)
“हमारे दौर के मुख्य वर्ग-संघर्ष से कट कर
जाति-विरोधी संघर्ष चलाने की जितनी भी कोशिशें हुई हैं वे सब
नाकाम ही रही हैं और उनकी उपलब्धि बहुत ही अल्प रही है|” (बी.टी.आर.)
“यह एक बार फिर साबत हो गया है कि जातीवाद विरोधि
संघर्ष को अलग-थलग करके नहीं चलाया जा सकता, इस संघर्ष को वर्तमान दौर के जनवादी आन्दोलन तथा वर्ग-संघर्ष का हिस्सा
बनाकर ही चलाना होगा|” (वही)
“जाति पर आधारित असमानता और अन्याय समाज का
अविभाज्य हिस्सा बन चुके हैं| इन अन्यायुं के खातमें के लिए सरे शोसित तबकों
की, चाहे वे किसी भी जाति के क्यों न हों, सब को एकजुट होकर लड़ना होगा|” (वही)
“मेहनतकशों के सभी हिस्सों को-चाहे वे किसी भी
जाति के क्यों न हों- यह सिखाना होगा कि इन झुनझुनों से कोई एक समस्या
भी हल होने वाली नहीं है| इन से न तो दलित वर्गों कि हालत बेहतर होगी, और न ही बेकारी की समस्या ही हल हो सकेगी| इन से उनके मुख्य शत्रुओं- पूंजीपतियों तथा भूस्वामियों- की ओर से ध्यान जरूर बंट सकता है|” (वही)
“वर्तमान सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था
सम्पत्ति के सम्बन्धों पर आधारित है| ये सम्पत्ति के सम्बन्ध ही जातीवादी तथा वर्गीय
उत्पीड़न को बरकरार रखे हैं| यह सोचना अपने को धोखा देना है कि अर्थव्यवस्था पर
भू-स्वामियों तथा इजारेदार पूंजीपतियों के कब्जे को खत्म किए
बिना और पूंजीवादी-सामंती सरकार के शासन को उखाड़े बिना छुआछूत या
जातिवाद को मिटाया जा सकता है| जातिव्यवस्था के खात्मे का सवाल पूंजीपति-भूस्वामी वर्ग के
खात्में और समाजवाद कि दिशा में आगे बढने के सवाल से जुड़ा. हुआ है|” (वही)
“जाति क्यों नहीं जाती?” (शैलेन्द्र शैले)”
“जाति एक भ्रम है, यह दंभ है,यह मानसिक दासता है, यह मिथक है, एक अंधविश्वास है,एक रूढ़ी. है| जाति एक चेतना है| मार्क्स के अनुसार—जब चेतना हृदय में
घर कर जाति है तो वः एक भौतिक शक्ति बन जाती है| मनुष्य के चेतना-जगत् में लम्बे और दीर्घकालिक वैचारिक युध्द के
बाद ही उसकी जड़ें उखड. सकती हैं|” (वही)
“समाजिक चेतना तो खुद सामाजिक परिस्थितयों कि उपज
होती है| इसी लिए जातिचेतना पीढ़ी दर पीढ़ी बनी हुई है क्योंकि वे
सामाजिक परिस्थितियाँ लगातार मौजूद हैं जो उसे फलने-फूलने कि ज.मीन मुहैया करवाती
है|” (वही)